Shree Ram ji

 जब चक्रवती सम़ाट दशरथ जी महाराज देह त्याग कर देवलोक चले गए और मां के प़ाणप़िय राम,लखन और जानकि वन में चले गए और त्याग कि मुर्ति भरत जी नन्दी ग़ाम में संन्यासी रुप में रहने लगे,तब से राम महतारी मां कोशल्या ने  सम्पूर्ण राजसुखो का त्याग कर दिया और अंतपुर में राजप्रासाद के मुख्य द्वार पर एक चटाई बिछाकर उस पर बैठी रहती है।उस चटाई के आसन पर विराजमान विवेक और धैर्य की मुर्ति मां कोशल्या को इसी राजप्रासाद में जो उत्सव और आनन्द मनाए गए थे,आज उनकी स्मृति ताजा हो गईं।

मां कोशल्या को चारों भाइयों के प़गटोत्सव के समय इसी महल में जो जन्मोत्सव की बधाईयां बांटी गई वो यादें ताजा हो गईं उसके बाद चारों भाइयों के करनबेद,जनेऊ धारण व चुड़ाकरण संस्कार आदि इसी आंगन में बड़ी धूमधाम से मनाऐ गए वो लम्हे आज मां कोशल्या को याद आ रहे हैं।  इसी क्रम में चारों भाइयों ने राजमहल के आंगन में जो महाराज दशरथ जी की उपस्थिति में अनेक प्रकार की बाललिलाएं दिखाई वे सभी एक-एक करके आज मां कोशल्या कि स्मृति में आ रही है। चारों भाइयों के छोटे-छोटे धनुष बाण और तरकस जो राजमहल की दीवारों पर टगें हुए थे, जब मां कोशल्या कि दृष्टि उन बालकों के छोटे-छोटे आयुधों पर पड़ती है,तब तो मां कोशल्या का हृदय टुकड़े- टुकड़े होने लगता है,तब मां धैर्य धारण करके इस अवसाद से निकलने की कोशिश करती है,  परन्तु पुरानी यादें मां कोशल्या को पुनः अपने आगोश में ले लेती है और मां मौन हो जाती है, इसी अवस्था में फिर वही क़म चल पड़ता है।      चारों पुत्रों का विवाह उत्सव, ढोल नगाड़ों के साथ चारों भाइयों का सुन्दर दुल्हो के रुप में वर-वधू के साथ अयोध्या में आगमन और महाराज दशरथ के द्वारा अनेकों न्योछावर देना। उसके उपरांत शुरू होता है हृदय विदारक कारूण दृश्य -।   चारों पुत्रों कि अनुपस्थिति में दशरथ जी महाराज का परलोक गमन गोस्वामी जी लिखते हैं:--

राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम। 

तनु परिहरि रघुवर बिरहं, राऊ गयउं सुरधाम।।

इस तरह मां कोशल्या पति वियोग और बनवासी राम,लखन व जानकि की विरह-वेदना में डुबी हुई थी,तब अचानक उनकि दृष्टि शत्रुघ्न पर पड़ती है जो कि राजप्रासाद के एक मणि जड़ित स्तम्भ को पकड़ कर सिसक-सिसक कर रो रहें हैं, तब मां चटाई पर से खड़ि होकर शत्रुघ्न के पास जाति है और कहति है कि   "" बेटा शत्रुघ्न'',   ""मेरे लाल ''  क्या बात है, क्यों रो रहें हों  ?

तब शत्रुघ्न जी रुंधे हुए गले से बोलते हैं कि    ""है मां''    पिता जी स्वर्ग में ।

               मेरे प़ाण प़िय भाई श्री राम, श्री लखन और मां जानकी वन में ।

मेरे प्राणों के आधार भरत भईया नंदीग्राम में।

तब मां में कहां जाऊं ? 

ऐसे प्रेम व स्नेह से अभिभूत हृदय को द़वित करने वाले बचन सुन मां कोशल्या का धैर्य भी ज़बाब दे गया । परन्तु मां कोशल्या तो श्री राम जी की जननी है, मां कोशल्या ने धीरज धारण किया और पुनः अपने को संभालते हुए, कहने लगी:--

मेरे प्यारे शत्रुघ्न बेटे तुम्हारा जन्म किस कुल में हुआ है?

"शत्रुघ्न बोले''  :--  मां सुर्यकुल में ।

तब मां कोशल्या बोली:-- बेटा शत्रुघ्न'' सुर्य को तपना पड़ता है और खुद अपने को अपनी ही आग में जलना पड़ता,तब जाकर वो सुर्य संसार भर को प्रकाशित करता है । इसलिए बेटा शत्रुघ्न''तेरा जन्म भी उस सुर्य कुल में हुआ है, अतः बेटा शत्रुघ्न''तुम भी इस अयोध्या के भानुवंश के लिए तपो,तपो,तपो  ।

इस प्रकार मां कोशल्या के सार गर्भित बचन सुन कर मानस के मौन पात्र श्री शत्रुघ्न जी महाराज मां कोशल्या के चरणों में गिर पड़े। और उनका सम्पूर्ण समाधान हो चुका था ।

मानस का एक-एक पात्र हमारे लिए आदर्श है बस इस शास्त्र में रूचि पैदा करने की जरूरत है। सभी को सादर वंदन।  ।।  जय सियाराम।।

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